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‘बांटो और राज करो’ की नीति को समझो और अपने समाज की ताकत को कमजोर मत होने दो

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समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l  सदियों से फूट डालने के षड्यंत्र रचे जाते रहे और आज भी विभिन्न राजनीतिज्ञ समय समय पर ऐसे षड्यंत्र रचते रहते हैं l आप और हम इस नीति के शिकार होते रहते है और हमारा समाज बहुमत में होते हुए भी हम शासन व्यवस्था से बाहर रहते है l इसके कारण जानने के लिए आपको यह फुट डालो और राज करो की व्यूहरचना कैसे होती है इस कहानी से समझ में आ जाएगी l इस कहानी के लेखक को मैं जानता नहीं लेकिन प्रेरणादायक कहानी के लिए लेखक को मेरा बारम्बार प्रणाम है l

एक गांव में प्रधानी का चुनाव था। गैर-अम्बेडकरवादी उस पद के पुश्तों से खानदानी दावेदार रहे थे। आखिर उनके पूर्वजों की सीट थी! लेकिन ये क्या? आग लगे ऐसे सामाजिक बराबरी के आंदोलन को! अबकी बार गांव की सीट रिजर्व हो गयी और SC वर्ग के लिए आरक्षित हो गई। विद्रोही स्वभाव का ननकू चुनाव में खड़ा हो गया।

SC वोट सबसे ज़्यादा थे, सभी SC अगडों की ज़्यादती और शोषण से नाराजगी के चलते एकजुट भी थे। लेकिन गैर-अम्बेडकरवादियों ने भी अपनी चाणक्य बुद्धि घुमाई और बहुजनो की प्रत्येक बिरादरी से जैसे बाल्मीकि, धोबी, खटीक, बाजीगर,लोहार आदि के नाम पर कैंडिडेट खड़ा करवा दिया! अब रज्जन, जीतन भी पर्चा भर मैदान में आ गए।

गैर-अम्बेडकरवादियों ने दोनों को चुनाव हेतु वित्त भी उपलब्ध करा रहे थे। चुनाव त्रिकोणीय हो गया था। लेकिन फिर भी जीतना तो कोई बहुजन ने ही था। ननकू,रज्जन और जीतन तीनों आपस में ज़रूर लड़ रहे थे l लेकिन बहुजन हितों के लिए प्रतिबद्ध थे। उनकी बिरादरियां उनके पीछे खड़ी थीं। उधर गांव के अगडी जाति के ठाकुर और वैश्य बड़े धर्म संकट में थे कि आखिर किसे वोट दें?

क्या अब बहुजनो के दरवाजे पर जुहार करना पड़ेगा? कलियुग आ गया लगता है! सत्यनाश हो इस प्रजातंत्र और संविधान का! ऊंच नीच सबको एक घाट का पानी पिला दिया। सब अगड़ों के बड़े बूढे व्यक्ति भी ड्योढ़ी में हाजिरी बजाने पहुंचे और धर्म संकट से उबारने का उपाय पूंछने लगे। चाणक्य बुद्धि के सभी अभी विचार कर ही रहे थे कि आंगन में झाड़ू लगाते रमुआ पर नज़र जा पड़ी! चाणक्य बुद्धि वालो की खोपड़ी में बिजली सी दौड़ी!

रमुआ का पूरा नाम रामनाथ मेहतर था। तीन पीढ़ियों से रमुआ का परिवार चाणक्य बुद्धि वालो के यहां बंधुआ था। तीन पीढ़ियों से रमुआ के पूर्वज चाणक्य बुद्धि वालो के पूर्वजों के पोतड़े धोते,गंदगी साफ करते, खेतों में काम करते और ड्योढ़ी पर सलाम बजाते रहे थे। रमुआ भी अपने पिता की टी बी से हुई मौत के बाद बचपन से ही चाणक्य बुद्धि वालो की सेवा में था और उन्हें ही अपना अभिभावक मानता था। लेकिन कर्ज़ था कि साफ ही नहीं हो पा रहा था। ब्याज पर ब्याज जुड़ता ही जाता था।

खैर नामांकन के आखिरी दिन तीनों उम्मीदवार एक झटका और खाये। अब चौथा उम्मीदवार रमुआ भी सामने था। नामांकन पत्र पर चाणक्य बुद्धि वाले महाशय उसके प्रस्तावक थे,ठाकुर राजा और लाला जी उसके समर्थक थे,सारी सफाई कर्मियों की बिरादरी उसके पीछे थी,चाणक्य बुद्धि वाले,ठाकुर राजा और लाला जी का वित्त, शराब, आटा, मुफ्त खाना,  नौटंकी और उनकी बिरादरी के समर्थन भी उनके साथ था।

नतीजा बिल्कुल वैसा ही आया जैसा चाणक्य बुद्धि वालो ने आंका था। बहुजन SC और पिछड़े वोट आपस में कट और बंट गए। रमुआ की बिरादरी के वोट के साथ ब्राह्मण,ठाकुर और वैश्य वोट आ जुड़े। अन्य पिछड़े बिरादरी के न तीन के थे न तेरह के रहे। वो एक द्वार से दूसरे द्वार दौड़ते ही रह गए!

अब चाणक्य बुद्धि वालो के अहाते के बाहर ही प्रधान का बोर्ड लगा है। बस नाम रमुआ का है। सारे कागज, विकास, ठेके और काम काज चाणक्य बुद्धि वाले ही देखते हैं। रमुआ बस अंगूठा टेक रबर स्टाम्प लगा फिर से झाड़ू लगाने में व्यस्त हो जाता है। हाँ अब उसे खैनी रगड़ होंठ के नीचे दबाने और काम से रुक जाने पर गाली नहीं दी जाती।

गांव के लोग उसे प्रधान कहने लगे हैं और हाँ उसे रोज़ देसी शराब का एक पौव्वा बख्शीश में मिल ही जाता है। रमुआ अपने इस ऐशो आराम भरी ज़िन्दगी से खुश है। आज ऐसे रमुआ हर गाँव,कस्बे में मिल जाते हैं। जो रमुआ नहीं होते वे चुनाव जीतने के बाद बन जाते हैं। पंचायत से संसद तक ऐसे रमुआ की भरमार है।

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